क्यों लौटाई रबीन्द्रनाथ टैगोर ने अंग्रेज़ों द्वारा दी गई नाइटहुड की उपाधि

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महान बंगाली कवी रबीन्द्रनाथ टैगोर को कौन नहीं जानता , टैगोर कवी होने के साथ ही गायक , उपन्यासकार और चित्रकार भी थे। रबीन्द्रनाथ टैगोर का जन्म 7 मई 1861 में कोलकाता में हुआ था। टैगोर महज़ आठ साल के थे जब उन्होंने अपनी पहली कविता लिखी थी और 16 साल की उम्र में उनकी बड़े कविता का संग्रह भी पफरकाशित हुआ। टैगोर का विवाह 22 साल की उम्र में साल १८८३ में मृणालिनी देवी से हुआ और उन्हें पांच बच्चे हुए जिसमे दो की मृत्यु जल्द ही हो गई।

1910 में रबीन्द्रनाथ टैगोर की सबसे प्रचलित किताब प्रकाशित हुई “गीतांजलि” जिसने इतिहास रच दिया और जिसके लिए टैगोर को 1913 में नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। टैगोर ने भारत का राष्ट्र गान भी लिखा जिसे पहली बार 27 दिसंबर 1911 को भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस के कलकत्ता के सत्र में गाया गया। रबीन्द्रनाथ टैगोर ने भारत के अलावा बांग्लादेश का भी राष्ट्र गान लिखा। टैगोर के काम के लिए 1915 में ब्रिटिश क्राउन ने भी उन्हें निघतूड़ की उपाधि दी। लेकिन उन्होंने 1919 में जलियांवाला बाघ के नरसंघार के बाद ये उपाधि उन्हें वापस कर दी।

14 जुलाई 1930 एक ऐसा ऐतिहासिक दिन जब विज्ञानं और आध्यात्मिकता की एक उल्लेखनीय मुलाकात हुई। इस दिन रबीन्द्रनाथ टैगोर ने अल्बर्ट आइंस्टीन से मुलाकात की और दोनों ने विज्ञान और धर्म के बीच सालों पुराने घर्षण की चर्चा की। टैगोर की मृत्यु 7 अगस्त 1941 को लम्बे समय तक बिमारी से जूझने के बाद हुई। रबीन्द्रनाथ टैगोर को “गुरुदेव” के नाम से भी जाना जाता है। टैगोर को महात्मा गाँधी ने गुरुदेव की उपाधि उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए दी।

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