जानिए किस चतुराई के साथ भारतीय नौसेना ने जीती ये जंग

0
603

4 दिसंबर यानी आज पूरा देश मना रहा “नौसेना दिवस “। ये दिवस 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध में जीत हासिल करने वाले नौसेना पुरुषों की शक्ति और बहादुरी के जश्न के रूप में मनाया जाता है। साल 1971 में 3 दिसंबर के दिन पाकिस्तानी सेना द्वारा हमारे हवाई क्षेत्र और सीमावर्ती क्षेत्र में हमला किया था। इस हमले ने 1971 के युद्ध की शुरुआत की थी। इनकी वीरता के शानदार प्रदर्शन को चिह्नित करने के लिए हर साल 4 दिसंबर को नौसेना दिवस मनाया जाता है।

तो आज इस ख़ास अवसर पर क्यों ना चर्चा की जाए “ग़ाज़ी अटैक” के बारे में। आपमें से भूतो ने इसपर बनी एक फिल्म भी देखि ही होगी। वैसे आपको बतादे एशिया में अगर सबसे पॉवरफुल नवी अगर किसी की थी तो वो थी भारत की। जी हाँ। तब चीन के पास भी कोई एयर क्राफ्ट कर्रिएर नहीं था। यहाँ तक की आज भी हम दुनिया के सबसे बड़े एयर क्राफ्ट कर्रिएर ऑपरेटर है अमेरिका के बाद।

जहा तक रही ग़ाज़ी की बात। तो भारत के पास तब कोई सबमरीन नहीं थी। ” पि एन एस ग़ाज़ी” पाकिस्तान की एक सबमरीन का नाम था। आज हलाकि ये सबमरीन इस दुनिया में नहीं है। लेकिन इसने भारत के खिलाफ दो युद्ध लड़े 1965 और 1971 में। ये सबमरीन दरअसल अमेरिका की सबमरीन थी। 1945 में ये अमेरिका की नेवी में शामिल हुई थी। 1964 में इससे डी कमिशनड यानि रिटायर कर दिया था।

अब इस रिटायर्ड सबमरीन को पाकिस्तान ने खरीद लिया था 1.5 मिलियन डॉलर देकर। इसकी रेफिटिंग फिर 1970 में जाकर हुई। भारत की नव सेना का जो डिस्ट्रॉयर जहाज़ जिसका नाम आई एन एस राजपूत था उसने इसको बरसों पहले आज के ही दिन यानी 4 दिसंबर 1971 को ख़त्म कर दिया था।

ग़ाज़ी ने दरअसल पाकिस्तान की नेवी को बेहद पावरफुल बना दिया था क्युकी उस समय भारत के पास कोई भी सबमरीन नहीं थी। जो थी वो था एयर क्राफ्ट कर्रिएर। एयरक्राफ्ट कर्रिएर होने के कारन ही एशिया में ये सबसे पॉवरफुल नेवी थी और है भी। 1965 में जो वॉर हुआ था उसमे ग़ाज़ी को टारगेट दिया गया भारत के एयर क्राफ्ट कर्रिएर “आई एन एस विक्रांत” को मार गिराने का। इसके अलावा बड़े डिस्ट्रॉयर शिप्स को भी टारगेट करने का इसको काम दिया गया था।

सबमरीन का काम है साइलेंटली छिपे रहना और दुसमन का काम तमाम कर के निकल जाना। दुसमन की पकड़ में ही ना आना होती है सबमरीन की ख़ासियत। लेकिन ग़ाज़ी जो है “आई एन एस विक्रांत” को डिटेक्ट ही नहीं कर पाया क्युकी इसमें कम्युनिकेशन इक्विपमेंट में डिफेक्ट थी। तो मारने या डैमेज का सवाल ही नहीं उठता।

1970 में दुबारा से इसकी रेफिटिंग भी हुई थी टर्की में। पाकिस्तान अमेरिका से नाराज़ था की बहुत पुराने वर्ल्ड वॉर के ज़माने के इक्विपमेंट है इसमें। दुश्मनो को ये डिटेक्ट तक नहीं कर सकता इत्यादि।

अब अगर 1971 के वॉर की बात करे तो वह भी ग़ाज़ी को बहुत से काम दिए गए। ये वॉर बंगलदेश के क्रिएशन का कारन था। तब इंडियन नेवी की एक्टिविटी बंगलादेश के एरिया में ,बे ऑफ़ बंगाल में काफी बढ़ गई थी और इससे पाकिस्तान की नेवी ने ये नडाज़ा लगा लिया था की बंगलदेश की तरफ भारत एक बड़ा ऑपरेशन करेगा ।

येसब देख कर पाकिस्तान ने सोचा यहाँ आई एन एस विक्रांत भी ज़रूर होगा। इस कारन उन्होंने ग़ाज़ी को भेज दिया। उस समय सैटेलाइट भी इतना मज़बूत नहीं था और सबमरीन आती है है छिप के तो डिटेक्ट करना कितना मुश्किल होगा सोच लीजे। लेकिन फिर भी भारत ने उसकी मौजूदकी पकड़ली।

पाकिस्तानी ऑफिसर्स की बातो से ये पकड़ा गया था जहा वो किसी लुब्रीकेंट की बात कर रहे थे जो के सबमरीन में ही इस्तेमाल होता है । अब भारत्या नवी ने अंदाजा लगा लिया के विक्रांत को खतरा है और वो तब बे ऑफ़ बंगाल में मौजूद भी था। इसके लिए प्लानिंग ऑपरेशन शुरू हो गई। विक्रांत को एक ख़ुफ़िया जगह पहुचा दिया था। वो ख़ुफ़िया जगह कौनसी थी वो आज भी किसीको ठीक से नहीं मालूम।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here