भारत रत्न : कैसे बचाई मोक्षगुंडम विश्वेश्वरय्या ने हैदराबाद के लोगों की जान ?

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प्रसिद्ध रूप से सर एमवी के नाम से जाने जानेवाले डॉ. मोक्षगुंडम विश्वेश्वरय्या का जन्म 15 सितम्बर 1861 में कर्णाटक एक गाँव में हुआ था। विश्वेश्वरय्या 12 साल के थे जब उनके पिता गुज़र गए , जिसके बाद उन्होंने अपनी पढाई के लिए कड़ी मेहनत की। कुछ लोग ऐसा बताते हैं की भारत के सर्वश्रेष्ट इंजीनियर , पढ़ाई के लिए बैंगलोर के, यूनाइटेड मिशन स्कूल करीब 60 किलोमीटर तक चल कर आते थे। अपने जीवन काल में उन्होंने सिविल इंजीनियर के तौर पर कई महत्वपूर्ण काम किये हैं।

मोक्षगुंडम विश्वेश्वरय्या ने अपनी सिविल इंजीनियरिंग की डिग्री बॉम्बे विश्वविद्यालय से प्राप्त की। 1909 में उन्हें मैसूर में मुख्य इंजीनियर के स्थान पर नुक्त किया गया, इसके अलावा साल 1912 से 1918 तक उन्होंने मैसूर के 19 वें दीवान के तौर पर सेवा की। मैसूर में दिए गए अपने योगदान की वजह से वो “आधुनिक मैसूर राज्य के पिता” के नाम से भी जाने जाते हैं। मोक्षगुंडम विश्वेश्वरय्या जब सिंचाई आयोग में नियुक्त किये गए उन्होंने सिंचाई की एक जटिल प्रणाली को लागू किया। इसके अलावा ग्वालियर में मौजूद कृष्णा राजा सगरा नाम के डैम को भी स्थापित किया।

शिक्षा और इंजीनियरिंग के क्षेत्र में दिए गए उनके योगदान की वजह से साल 1955 में उन्हें भारत के सबसे ऊंच पुरस्कार भारत रत्न से सम्मानित किया गया। उन्हें अपने कार्यों के लिए सबसे ज़्यादा सराहना मिली जा उन्होंने हैदराबाद में बाढ़ संरक्षण प्रणाली का निर्माण किया। उन्होंने समुद्री अपक्षरण से विशाखापत्तनम को सुरक्षित करने के लिए भी कई महत्वपूर्ण काम किये। डॉ. मोक्षगुंडम् विश्वेश्वरय्या अपने जीवनकाल में अंग्रेजी के एक मुहावरे ” वर्क इस वरशिप” यानी ” काम पूजा है” को पुरे दिल से मानते थे।

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