इंद्रप्रस्थ की महारानी द्रौपती के 3 रोचक तथ्य

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दोस्तों क्या आप जानते है द्रौपती को 5 पति मिलना विधि का विधान था। यानि ये होना ही था उनके जीवन में।पूर्व जनम में द्रौपती का नाम था नलिनी। नलिनी ने बहुत ही कड़ा तप किया था भगवन शिव के लिए। इस कड़ी तपस्या से भगवान शिवं अत्यंत खुश हुए। शिव जी ने उनसे कोई भी इच्छा पूरी करवाने को कहा।

नलिनी ने तब भगवन शिव से ऐसा पति माँगा जिसमे 14 गुण हो। द्रौपती चाहती थी उनका पति विश्व में सबसे ज़्यादा बुद्धिमान हो, सबसे ज़्यादा बलवान हो,हृदय में सबसे ज़्यादा करुणा हो ,सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर हो,सबसे सुन्दर हो आदि।

ऐसे में शिवजी थोड़ा हिचकिचाए। उन्हें लगा भला एक मर्द में इतने गुण कहा से मिलते। फिर भी उन्होंने तथास्तु कहा और वरदान देकर चले गए। एक पुरुष में इतने गुण होना कभी भी संभव नहीं। इस वजह उनका विवाह हुआ 5 पांडव से। ये 5 पंडाव यदि मिल जाए तो सारे 14 गुण प्राप्त हो जाते है।

दोस्तों आपको ये तो पता होगा के जब दरुपति का चीरहरण हो रहा था। तब श्री कृष्ण ने आकर के एक कभी न खत्म होने वाली साड़ी उनकी साड़ी से जोड़ दी थी। इस वाक्य के साथ एक और वाक्य जुड़ा हुआ था। ऋषि दुर्वासा जो अपने श्रापो और वरदानो के लिए काफी प्रसिद्ध थे। एक बार वे गंगा किनारे स्नान करने आगे और उनका वस्त्र गंगा में बहकर चला गया।

इसको देखते ही द्रौपदी ने तुरंत अपनी साड़ी का एक टुकड़ा फाड़ा और उनको देदिया। इसे खुश होकर उन्होंने वरदान दिया के एक ऐसा वक़्त आएगा जब तम्हे वस्त्र की पूर्ति हगि जो कभी न खत्म हो। और श्री कृष्ण बने इस वरदान का ज़रिया।

तीसरा और सबसे रोचक तथ्य अब आपको बताते है। ये तो हम सब जानते है की द्रौपती 5 पांडवो की रानी थी। द्रौपती जी ने पांचो पांडव के सामने एक प्रस्ताव भी रखा था। एक गज़ब की शर्त राखी उन्होंने। उन्होंने वचन लिया के वे किसी और के संग विवाह करने के बाद भी किसी और पत्नी को इंद्रप्रस्थ (आज की दिल्ली ) की रानी नहीं बनाएंगे।

पांडवो ने कई विवाह करे भी लेकिन इंद्रप्रस्थ में किसी भी और रानी को नहीं लाया गया। हलाकि अर्जुन की तीसरी बीवी सुभद्रा जो के कृष्ण भगवन की बहन थी उन्हें इस घर में आने की अनुपति थी। श्री कृष्ण ने सुभद्रा को सिखाया की जाकर ये कहे की “दीदी मैं आप के घर अर्जुन की बीवी बनकर नहीं,बल्कि आपके भाई कृष्ण की छोटी बहन बनकर आई। फिर क्या होता द्रौपती इसे कदापि मन नहीं कर सकती थी। इस प्रकार सुभद्रा जी का भी इंद्रप्रस्थ में प्रवेश हुआ।

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